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भारत को कॉमरेड चंदू के सपनों का भारत बनाना होगा..!


बिहार के राजनीति में तीन ऐसे शख़्सों का नाम शहादत देने में जुड़ा है, जिन्होंने व्यक्तिगत नहीं बल्कि शासन व्यवस्था में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्तियों के लिए शहादत दी.! जिसमें एक नाम जगदेव प्रसाद का है तो दूसरा जगदीश मास्टर का और तीसरा कॉमरेड चन्दू का.!

1970 के दशक में “100 में 90 शोषित हैं और शोषित भाग हमारा है” का नारा देकर गोलबंदी करने वाले अमर शहीद जगदेव प्रसाद थे तो 1980 के दशक में पूरे बिहार में शोषण वंचित तबकों के संगठित करके नक्सल आंदोलन को खड़ा करने वाले शहीद जगदीश मास्टर थे और 1990 के दशक में शासन व्यवस्था में वंचित लोगों को एकत्रित करने वाले जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष कॉमरेड चंदू थे..!

चंद्रशेखर भारत के लिए एक बड़ी उम्मीद का नाम था, जिसे यह देश संभाल नहीं पाया..! कॉमरेड चंदू में एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की संभावनाएं भी मौजूद थीं..! 1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे..! जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रस्ताव लाए तो उन्हें उनका यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया..! समय की कमी का बहाना बनाया गया..!

चंद्रेशेखर ने वहीं ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तीसरी दुनिया के देशों के अन्य प्रतिनिधियों का एक ब्लॉक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया..! इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जबरदस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताओं से मिले और सियोल में बीस हजार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया..! यह एक खतरनाक काम था, जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिए जाने का खतरा उठाकर उस काम को अंजाम दिया..!

लेकिन 31 मार्च, 1997 को जेएनयू के छात्रों को ख़बर मिली कि दो बार जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके चंद्रशेखर को बिहार के सीवान में सरेबाज़ार गोलियों से भून दिया गया है..! वही चंद्रशेखर जो अपने दोस्तों के बीच चंदू थे, वही चंद्रशेखर जो अपने जेएनयू के छात्रों को कहकर गए थे- “हमारी आने वाली पीढ़ियां सवाल करेंगी, वे हमसे पूछेंगी कि जब नई सामाजिक ताक़तें उभर रही थीं तो आप कहां थे, वे पूछेंगी कि जब लोग जो हर दिन जीते-मरते हैं, अपने हक़ के लिए संघर्ष कर रहे थे, आप कहां थे जब दबे-कुचले लोग अपनी आवाज़ उठा रहे थे, वे हम सबसे सवाल करेंगीं.”

जब कॉमरेड चंदू की हत्या हुई, उस समय बिहार में धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और पिछड़ों के मसीहा लालू प्रसाद यादव की सरकार थी..! चंदू की हत्या पर जेएनयू के छात्र भड़क उठे..! नाराज़ छात्रों का हुजूम लालू यादव से जवाब मांगने दिल्ली के बिहार भवन पहुंचा तो वहां भी पुलिस की गोलियों से उनका स्वागत हुआ..! चंदू की हत्या का आरोप लालू यादव की पार्टी के सांसद शहाबुद्दीन पर था और प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोली चलाने का आरोप पुलिस के साथ-साथ साधु यादव पर..!

चंदू की हत्या का समय वह समय था, जब दुनिया में वामपंथ का सबसे मज़बूत क़िला सोवियत रूस ढह चुका था..! दुनिया तेज़ी से पूंजीवाद की ओर बढ़ रही थी..! उदारीकरण भारत की दहलीज लांघकर अपने को स्थापित कर चुका था...! तमाम धुर वामपंथी आवाज़ें मार्क्सवाद के ख़ात्मे की बात करने लगी थीं..!

उसी दौर की बात है, जब जेएनयू कैंपस में एक युवा छात्रनेता अपने साथियों से कह रहा था- “हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाज़ों की शक्ति होगी जिनको बचाने की बात हम सड़कों पर करते हैं. अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी, न कि जेएनयू से इलेक्शन में गांठ जोड़कर चुनाव जीतने और हारने की महत्वाकांक्षा होगी.”

दबी हुई आवाज़ों को बचाने की अलख जगाने वाले इस युवक ने जेएनयू के अध्यक्ष पद से हटने के बाद दिल्ली छोड़ दी और सीवान जाकर परिवर्तन का बिगुल फूंक दिया..! सीवान पहुंचकर चंदू ने बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के ख़िलाफ़ उनके गढ़ में ही मोर्चा खोल दिया..! उन्होंने बिहार की राजनीति में अपराध, बाहुबल, घोटालों और भ्रष्टाचार के मुद्दों को बहुत प्रमुखता से उठाया और जनता से उनको बेहतर प्रतिक्रिया मिल रही थी..!

चंदू भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का सपना देख रहे थे और इसकी शुरुआत भी कर दी थी..! बिहार में जनसंहारों और घोटालों के विरोध में 2 अप्रैल, 1997 को बंद बुलाया गया था..! इस बंद के लिए 31 मार्च शाम चार बजे जेपी चौक पर एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करते हुए चंदू और उनके सहयोगी श्याम नारायण को गोलियों से भून दिया गया..! इस गोलीबारी में एक ठेलेवाले भुटेले मियां भी मारे गए..!

जिस समय कॉमरेड चंदू की हत्या हुई, उस समय वहाँ कई लोग मौजूद थे, जिन्होंने हत्यारों को पहचाना.! वे शहाबुद्दीन के साथ के लोग थे..! हत्या की वजह राजनीतिक थी..! जिस शहाबुद्दीन के ख़िलाफ़ पत्रकार क़लम चलाने से डरते थे.! उसके गृहक्षेत्र में कॉमरेड चंदू ने पहली बार अपराध को एजेंडा बनाया और उनके ख़िलाफ़ बोलना शुरू किया था..!

चंदू भगत सिंह की तरह अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद से लड़ते हुए शहीद तो नहीं हुए, लेकिन लड़ते हुए मारे जाने की उनकी महत्वाकांक्षा पूरी हो गई..! वे भ्रष्ट और राक्षसी राजनीति से लड़ते हुए सरेबाज़ार मारे गए..!

चंदू उन चंद युवाओं में से थे जो व्यवस्था से टकराने का माद्दा रखता है, जो जनता की तरफ खड़े होकर भ्रष्ट तंत्र को बदल देने का सपना देखता है, जो ग़रीबों, मज़दूरों, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को संबोधित करता है...! लेकिन दुर्भाग्य से वैसा युवा इस देश की राजनीति को पसंद नहीं है...! इसलिए वह उस पर गोलीबारी कर देती है..! चंद्रशेखर बिहार की ग़रीब जनता के लिए एक उम्मीद बनकर उनके बीच काम करने गए थे, लेकिन लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का चोला ओड़ कर सामने आई बाहुबल की राजनीति ने उन्हें लील लिया..!

मगर आज भी भारतीय उपमहाद्वीप के हालात बदले नहीं हैं, बल्कि और बदतर होते जा रहे हैं। ऐसे में हमें बाबू जगदेव प्रसाद, जगदीशमास्टर और चन्दू जैसे लोगों को अपना प्रस्थान बिंदु बनाना औऱ बनाकर फिर से भारत को चंदू के सपनों का भारत बनाना होगा और उसमें एक बड़ी युवा पीढ़ी को आगे आना होगा..! क्योंकि एक सवेरा होना अभी बाकी है और चंदू को तरसना बाकी है..!

अंतत: निष्कर्ष यह निकलता है कि कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्या करने वाली बंदूक ‘धर्मनिरपेक्ष’ थी..!

“सबसे मासूम सपनों को

कुचलने वाले पैर

सबसे सुंदर संभावना को

छलनी कर देने वाली गोलियां

सबसे निश्छल आवाज़ को

दबा देने वाले क्रूर हाथ

इन सबकी छवियां धर्मनिरपेक्ष थीं…!”



यदि आपको वक़्त मिले तो YouTube पर जाकर “Ek Minute Ka Maun” Documentary (https://youtu.be/JmHv8pbUKhc) को ज़रूर देखें, यह Documentary कॉमरेड चंदू के जीवन पर आधारित है..!





Note:- इस लेख का हिस्सा The Bharat News और The Wire के Articles से लिया गया है..!


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