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आख़िर “पार-तापी-नर्मदा रिवर लिंक परियोजना” के ख़िलाफ़ आदिवासी समुदाय आंदोलन क्यों कर रहा है..?


यह देश जब आज़ाद हुआ था तो यह तय किया गया था कि इस देश के निर्माण में सभी समुदायों, वर्गों और धर्मों के लोग अपना योगदान देंगे। लेकिन हम देख रहे है कि आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी आदिवासी समुदाय तथाकथित विकास के नाम पर अपने जल, जंगल, ज़मीन, अधिकार और स्वाभिमान से बेदख़ल किया जा रहा है।आदिवासी समुदाय की कुछ पीढ़िया ऐसी है, जो दो-दो बार तथाकथित विकास के नाम पर अपने जल-जंगल-ज़मीन से बेदख़ल हो चुकी है। आज भी आदिवासी समुदाय के लोग अपनी अस्मिता, संस्कृति, जंगल और ज़मीन पर पराम्परागत अधिकारों को सरकारों और पूंजीपतियों के गठजोड़ से बचाने के लिए लगातार संघर्षरत हैं।

इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे पार-तापी-नर्मदा नदी लिंक परियोजना की जो अभी सुर्ख़ियों में है। यह परियोजना इसलिए सुर्ख़ियों में है क्योंकि गुजरात और महाराष्ट्र राज्य के आदिवासी समुदाय के लोग इस परियोजना के ख़िलाफ़ लगातार आंदोलनरत है और अपने जल, जंगल, ज़मीन, अधिकार एवं स्वाभिमान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे है।


(Photo Credit :- क्रांति योद्धा / Instagram ID:- @TheKrantiYoddha)


क्या है पार-तापी-नर्मदा लिंक परियोजना:-


इस परियोजना के नाम से प्रतीत होता है कि यह इन नदियों को जोड़ने की कोई परियोजना है। लेकिन वास्तविकता में यह नदियों को जोड़ने की परियोजना नहीं बल्कि नदी लाभ क्षेत्र (कमांडिंग क्षेत्र/सिंचित क्षेत्र) से पानी को दूसरी तरफ़ मोड़ने की परियोजना है।


यह परियोजना केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट है। इस नदी लिंक परियोजना के क्षेत्र में गुजरात और महाराष्ट्र का क्षेत्र शामिल है। इस नदी लिंक परियोजना के तहत कुछ सात बाँधों का निर्माण होना है, जिनमें से छह बाँधों का निर्माण गुजरात के वलसाड एवं डाँग जिलों में होना है और एक बाँध का निर्माण महाराष्ट्र के नासिक जिले में होना है।


भारत जल संसाधन सूचना प्रणाली के अनुसार “पार-तापी-नर्मदा नदी लिंक परियोजना” के तहत पश्चिमी घाट क्षेत्र में उपलब्ध अतिरिक्त जल को सौराष्ट्र और कच्छ के कम जल वाले क्षेत्र में भेजने का प्रस्ताव है।


इसी वर्ष केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट भाषण में इस परियोजना के लिए बजटीय आवंटन की घोषणा की गयी है।


गौरतलब है कि इससे पहले साल 2007-2008 में आदिवासियों के कड़े विरोध के बाद यह परियोजना रुक गई थी।

आदिवासी इस परियोजना के ख़िलाफ़ क्यों है:-


  • यह परियोजना संविधान की अनुसूची 5, पेसा अधिनियम-1996, वन अधिकार अधिनियम-2006 और भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 का उल्लंघन है।

  • इस परियोजना की वजह से बांधों के डूब क्षेत्रों में कम से कम सैकड़ों गांव और 7500 हेक्टेयर भूमि पूरी तरह से जलमग्न हो जाएंगे।

  • इस परियोजना की वजह से लाखों आदिवासी अपनी जमीन खो देंगे।

  • इस परियोजना के तहत दक्षिण गुजरात की नदियों के पानी को नर्मदा बांध की नहरों की ओर मोड़ देगी, जिससे दक्षिण गुजरात में सिंचाई और अन्य जरूरतों के लिए पानी की कमी हो जाएगी।

  • हम सब जानते है कि वर्तमान में हमारे देश के साथ-साथ पूरी दुनिया आज ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से जूझ रही है। ऐसी स्थिति में देश में वनों का विकास होना चाहिए ना कि तथाकथित विकास के नाम पर जंगलों को उजाड़ाजाना चाहिए। गुजरात में यदि समृद्ध वन बचे हैं तो वे डांग, वलसाड, नवसारी, तापी और नर्मदा जिलों में हैं। इस परियोजना की वजह से 15,000 एकड़ फैले गुजरात के सबसे समृद्ध वनों को संकट में डाल दिया जाएगा। जिससे राज्य के साथ-साथ देश को भी अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति होगी।

  • केंद्र सरकार ने नर्मदा योजना की विफलता को छिपाने के लिए परियोजना को डिजाइन किया है। जब नर्मदा परियोजना का काम शुरू हुआ था, तब सरकार ने दावा किया था कि गुजरात में 18 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई मिलेगी और उत्तर-गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ की पानी की समस्या भी स्थायी रूप से हल हो जाएगी। हकीकत यह है कि 18 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 2.50 लाख हेक्टेयर भूमि को ही सिंचाई का पानी मिलता है। बाक़ी का पानी औद्योगिक इकाइयों को सप्लाई किया जाता है। इसलिए सरकार किसानों के नाम पर योजना बनाकर पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाना बंद करें।

  • इस परियोजना पर लगभग 10000 हज़ार करोड़ खर्च किए जाएंगे, जिससे भारत के खजाने को बहुत बड़ा नुकसान होगा और फ़ायदा सिर्फ़ पूँजीपतियों को होगा।

आदिवासियों की माँग:-


  • यह परियोजना आदिवासी समुदाय और किसानों के हित में नहीं है इसलिए इस परियोजना को तुरंत प्रभाव से निरस्त किया जाएँ।

  • मध्य गुजरात, उत्तरी गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ में जमीन समतल है इसलिए सरकार परती भूमि या खेतों में तालाब खोदकर पानी इकट्ठा करने की दिशा में कोई कार्य योजना बनाएँ। साथ में इस परियोजना के पैसे को किसानों के कल्याण के लिए इस्तेमाल करें।

आदिवासियों का प्रतिरोध, सरकार की प्रतिक्रिया और मीडिया सपोर्ट:-

जैसे ही इस वर्ष के आम बजट में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट भाषण में इस परियोजना के लिए बजटीय आवंटन की घोषणा की गयी, ठीक उसके बाद से आदिवासी कार्यकर्ताओं ने लोगों को मोबलाइज करना शुरू किया। इसी क्रम में आदिवासी कार्यकर्ताओं ने मुंडन करवा कर अपना प्रतिरोध दर्ज करवाया और कई जगह छोटी-छोटी जनसभाएँ करके लोगों को जागरूक किया।


इस आंदोलन से जुड़ी कुछ बातें जानने के लिए जब हमने आदिवासी कार्यकर्ता मित्रांसु गामीत से बात की तो उन्होंने बताया कि “जब इस परियोजना के ख़िलाफ़ विरोध के स्वर उठने लगे तो भाजपा से जुड़े गुजरात के नेता कहते है कि ऐसा कोई प्रोजेक्ट नहीं आ रहा है। जबकि केंद्र सरकार इस प्रोजेक्ट का ज़िक्र अपने बजट में करती है और इस परियोजना का DPR भी तैयार हो गया है। वहीं महाराष्ट्र की सरकार ने साफ़ मना कर दिया है कि जो एक बाँध महाराष्ट्र में बनना है, वो उसके समर्थन में नहीं है और आंदोलनकारियों के साथ है।”


28 फ़रवरी को वलसाड जिले के धरमपुर में गुजरात और महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों के करीब पांच हजार से ज़्यादा आदिवासियों ने एकत्र होकर इस परियोजना के विरोध में प्रदर्शन किया। धर्मपुर प्रोटेस्ट के बाद 2 मार्च को गुजरात के मुख्यमंत्री और गुजरात राज्य के भाजपा प्रदेशाध्यक्ष ने कहा कि कोई प्रोजेक्ट नहीं आ रहा है और यह प्रोजेक्ट आदिवासी हित में नहीं है। लेकिन गुजरात सरकार अगले ही दिन अपने वार्षिक बजट में इस प्रोजेक्ट का ज़िक्र करती है।


आदिवासी कार्यकर्ता मित्रांसु गामीत अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते है कि “भाजपा सरकार आदिवासी समुदाय को गुमराह कर रही है। इसलिए International Indigenous Unity Flag, आदिवासी एकता मंच (गुजरात) एवं जनजातीय समन्वय मंच (भारत) के बैनर तले 5 मार्च को तापी में और 11 मार्च को डांग ज़िले के वघई में प्रोटेस्ट आयोजित किया गया, जिसमें हज़ारों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोगों ने हिस्सा लिया और प्रतिरोध दर्ज करवाया। आगामी 19 मार्च को गुजरात के कपराड़ा में इस परियोजना के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट किया जाएगा।


गुजरात राज्य में आदिवासी समुदाय के इस आंदोलन को लोकल मीडिया सपोर्ट तो मिल रहा है लेकिन स्टेट एवं नेशनल मीडिया का सपोर्ट सिर्फ़ 5-10% है। इसलिए सोशल मीडिया के माध्यम से आदिवासी समुदाय के लोग इस मुद्दे को राष्ट्रीय परिचर्चा का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहे है। ट्विटर पर “बाँध हटाओ और आदिवासी बचाओ”, “Cancel Tapi River Link” जैसे हैशटैग चल रहे है और देशभर के आदिवासी समुदाय के लोग गुजरात में जारी इस आंदोलन का समर्थन कर रहे है।


(यह तस्वीर वघई में आयोजित हुए प्रोटेस्ट की है।)



इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कौन है?


जब हमने आदिवासी कार्यकर्ता मित्रांसु गामीत से पूछा कि इस आंदोलन को नेतृत्व कौन कर रहा है तो उन्होंने कहा कि कई बार हम देखते है कि कोई National या International स्तर के NGO के लोग आदिवासी आंदोलनों को लीड करते है लेकिन उन आंदोलनों का कोई परिणाम नहीं निकलता है। इसलिए इस आंदोलन का कोई एक नेतृत्वकर्ता नहीं बल्कि सभी आदिवासी समुदाय के लोग और आदिवासी संगठन इस आंदोलन को लीड कर रहे है। इस आंदोलन में पूर्व सांसद मोहन देल्कर के पुत्र अभिनव देल्कर, वंसदा से कांग्रेस विधायक अनंत पटेल, महेश भाई वसावा, डॉ. प्रफुल वसावा, ज़िम्मी पटेल जैसे साथियों ने अहम भूमिका निभा रहे है और साथ में भारतीय ट्राइबल पार्टी, Aam Aadmi Party, Shiv Sena और कई आदिवासी संगठनों का भी समर्थन प्राप्त है।


अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मित्रांसु गामीत कहते है कि उन्होंने नर्मदा योजना, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, उकाई, दिल्ली-मुम्बई कोरिडोर, भारतमाला प्रोजेक्ट आदि जैसी कई परियोजनाएं देखी हैं; जहां आदिवासियों को उनकी भूमि से विस्थापित करने के बाद भी अब तक मुआवजा नहीं दिया गया है। इस परियोजना में भी 12000 एकड़ किसानों की ज़मीन, 15000 एकड़ जंगल और 25000 एकड़ गोचर एवं सरकारी ज़मीन शामिल है। जब आप इस प्रोजेक्ट से जुड़ी सरकारी वेबसाइट पर जाते है तो आपको पता चलेगा कि विस्थापन होने पर लोगों को 1.5 लाख घर बनाने के लिए दिए जाएँगे और 50 हज़ार शिफ़्टिंग के लिए दिए जाएँगे। किसानों की ज़मीन के लिए किसी मुआवजें का ज़िक्र नहीं किया गया है।

यह इस देश के नागरिकों को समझना होगा कि यह परियोजना नदियों को जोड़ने की परियोजना नहीं बल्कि तथाकथित विकास के नाम पर आदिवासी समुदाय को उनके जल जंगल ज़मीन से बेदख़ल करने की परियोजना है। आख़िर कब तक आदिवासी समुदाय के लोगों को तथाकथित विकास के नाम उजाड़ा जाता रहेगा? इस बार गुजरात के आदिवासी समुदाय के लोगों ने तय कर लिया है कि वो ना तो ज़मीन देंगे और ना जान देंगे, बल्कि अपने जल, जंगल, ज़मीन, अधिकार और स्वाभिमान के लिए संघर्ष करेंगे।



(अर्जुन महर दिल्ली विश्वविद्यालय में लॉ के स्टूडेंट है और वामपंथी छात्र संगठन AISA से जुड़े हुए है. साथ में दो किताबें भी लिख चुके है)

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